नारी

नारी

वो दाल रोटी के डब्बों में
घर के अचार मुरब्बों में
वो झाडू और सफाई में
घर आंगन की धुलाई में
धुलते कपड़ों के झाग में
जलते चूल्हे की आग में
घर बाहर के हर काम में
रात सुबह और शाम में
बच्चों के लालन-पालन में
सर्दी गरमी और सावन में
हर कसौटी पे परखी जाती थी
और अबला नारी कहलाती थी
मगर पिछले कुछ सालों से
ये आई बाहर इन तालों से
ज़माने की रफ्तार में
ढली नये अवतार में
पढ़ लिख अफसर बनी
खेल कूद मिट्टी में सनी
ट्रेन चलाए जहाज़ उड़ाए
कम्प्यूटर में नाम कमाए
जल थल नभ की सेना में
दिन दोपहर और रैना में
राजनीति के अखाड़ों में
समन्दर और पहाड़ों में
कोर्ट कचहरी केस में
देश में परदेस में
डाक्टर इंजीनियर अध्यापकगण
हर क्षेत्र में ही किया पदार्पण
हर जगह ही बाज़ी मारी है
ना कहना कि अबला नारी है
इस देश के कानूनों ने
कुछ ज़िद्दी और जुनूनों ने
लम्बी लड़ी लड़ाई है
तब ये घड़ी आई है
अभी और बहुत कुछ बाकी है
ये तो शुरुआत की झांकी है
कई लोगों को स्वीकार नहीं
समझें उनको अधिकार नहीं
मानसिकता ये संकीर्ण है
कि नारी पुरुष से हीन है
ये तो सोच का विकार है
कि नारी नर्क का द्वार है
सच ये है नारी बेहतर है
हर तुलना में बढ़-चढ़कर है
प्रकृति ये पुष्टि करती है
नारी पुरुष को जनती है
तजो रूढ़िवादी विचारों को
संग अपने बदलो हजारों को
नारी को सम्मान मिले
समाज का थोड़ा ध्यान मिले
तो नारी कुछ भी कर सकती है
समझो! वही पुरूष की शक्ति है

राहुल सूदन ‘पंछी’
08.12.2020

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