नीलकंठ: देवों के देव महादेव शिव का स्थान | स्थान | नील कंठ कैसे पहुंचें | ऋषिकेश में कॉटेजस्टे | नील कंठ का महात्म्य | नील कंठ का बाज़ार व अन्य सुविधाएं | ध्यान देने योग्य बातें

नीलकंठ: देवों के देव महादेव शिव का स्थान

स्थान
महादेव यानि भगवान शिव का स्थान नीलकंठ भारत के उत्तराखंड राज्य के पौड़ी गढ़वाल जिले में स्थित है। ऋषिकेश से इसकी दूरी लगभग 30 किलोमीटर है। ऊंची पहाड़ी पर होने की वजह से इस मंदिर तक पहुंचने का रास्ता सर्पदार है जो पहाड़ी को काट कर बनाया गया है। इस मंदिर के आस-पास का दृश्य बहुत मनोहर है।दूसरे पहाड़ों की चोटियां बहुत सुंदर लगती हैं। आस-पास के पेड़ों व वनस्पतियों और नीचे घाटी में बहती पावन गंगा नदी की धारा से असीम शांति का अनुभव होता है। पहाड़ों में सूर्य देर से नजर आता है और जल्दी अस्त हो जाता है जिससे वातावरण में ठंडक बनी रहती है।सर्दियों के मौसम यानि दिसंबर व जनवरी में नील कंठ का तापमान 2-4 डिग्री सेल्सियस तकपहुंच जाता है जबकि गर्मियों यानि मई-जूनमें 30-35 डिग्री सेल्सियस अधिकतम जाता है।बाकी महीनों में अच्छा मौसम बना रहता है।इसीलिए यहां पूरे साल सैलानियों व श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।

 

नील कंठ कैसे पहुंचें

नील कंठ मंदिर में शंकर भगवान के दर्शन करने के लिए पूरे विश्व से अलग अलग रास्तों व तरीकों का प्रयोग करते हैं।वायु मार्ग से आने के लिए देहरादून के जॉली ग्रांट हवाई अड्डे तक राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय उड़ानों वाले हवाई जहाज से आ सकते हैं। वहां से ऋषिकेश या नीलकंठ के लिए टैक्सी कर सकते हैं।इसी प्रकार दिल्ली एयरपोर्ट उतर कर वहां से भी ऋषिकेश या नीलकंठ के लिए टैक्सी कर सकते हैं।रेल से आने वाले यात्री हरिद्वार उतर कर वहां से ऋषिकेश या नीलकंठ के लिए टैक्सी कर सकते हैं।बससेआने वाले श्रद्धालु ऋषिकेश तक आ सकते हैं और वहां से नीलकंठ के लिए टैक्सी कर सकते हैं। अपनी कार से आने वाले टूरिस्ट गूगल मैप में नीलकंठ महादेव मंदिर की लोकेशन डालकर सीधे ही पहुंच सकते हैं।दिल्ली से कार/ टैक्सी का रास्ता लगभग 5 घंटे का है। ऋषिकेश/ देहरादून से एक घंटा और हरिद्वार से डेढ़ घंटा लगता है। ऋषिकेश से नीलकंठ मंदिर तक का रास्ता घुमावदार है जिस पर सिर्फअनुभवी और प्रशिक्षित चालकों को ही गाड़ी चलानी चाहिए।

 

ऋषिकेश में कॉटेजस्टे:

दूरदराज के इलाकों से आने वाले सैलानी सीधे नीलकंठ पहुंचने से पहले ऋषिकेश में एक रात कॉटेज स्टे भी करते हैं।इससे उनकी सफर की थकान भी उतर जाती है और अगले दिन सुबह नहा धोकर वे महादेव के दर्शन के लिए चले जाते हैं। कुछ लोग दो-तीन दिन तक वहां ठहरते हैं और ऋषिकेश के मौसम का आनंद उठाते हैं।इस दौरान वे गंगा नदी में रिवर राफ्टिंग का भी आनंद उठाते हैं और ऋषिकेश की बाकी जगहों जैसे लक्ष्मण झूला, राम झूला या दूसरे मंदिरों का भी भ्रमण करते हैं। कॉटेज स्टे के दौरान ब्रेकफास्ट, लंच, डिनर, घर का बना हुआ, सभी सैलानियों को दिया जाता है। सुबह शाम की चाय भी दी जाती है। वहां खेलने की कुछ सुविधाएं भी होती हैं जिसमें आप अपना समय व्यतीत कर सकते हैं और वहां के वातावरण का आनंद उठा सकते हैं। कॉटेज के पीछे बह रही पावन गंगा की धारा में नहा भी सकते हैं और वहां फोटोशूट भी कर सकते हैं। इसके अलावा आसपास की जगहों पर ट्रैकिंग भी कर सकते हैं।ऐसे डबलबेडकॉटेज 2 से 4000 रूपएके बजट में किसी भी मौसम में ऋषिकेश में उपलब्ध रहते हैं।

नील कंठ का महात्म्य:

ऐसा माना जाता है कि देवों और असुरों के बीच लगातार संग्राम चलता रहता था। तब ऐसा सोचा गया कि क्षीरसागर समुद्र का मंथन करके अमृत को निकाला जाए और उसे सभी सुरों और असुरों में बांट दिया जाए ताकि युद्ध काआनंद बरकरार रहे और उसमें कोई हताहत ना हो। एक दूसरी कथा के अनुसार जब देव गण असुरों से परास्त होने लगे तब भगवान विष्णु जी ने उनको यह मार्ग सुझाया कि समुद्र मंथन करके अमृत प्राप्त किया जाए ताकि देव अमर हो सकें। किंतु समुद्र मंथन अकेले देवों द्वारा करना संभव नहीं था इसलिए उन्होंने असुरों को भी साथ में आने को कहा ताकि दोनों पक्ष मिलकर समुद्र मंथन करें और मिलने वाले अमृत को दोनों आपस में बांट लें। क्षीर सागर समुद्र मंथन करने के लिए भगवान विष्णु स्वयं कच्छप अवतार लेकर समुद्र में रहे और उनकी पीठ के ऊपर मंदार पर्वत को मथनी बनाकर व वासुकी नाग को रस्सी बनाकर समुंद्र को मथा गया।समुद्र मंथन के समय सबसे पहले जल से विष, जिसे हलाहल कहा गया, निकला। इस विष के प्रभाव से त्राहि-त्राहि मचने लगी तथा सुर और असुर दोनों पक्षों में भय व्याप्त गया। तब देवों ने महादेव भगवान शिव से प्रार्थना करी कि वे मदद करें। भगवान शिव ने उस विष को अपनी ओक में भर कर पी लिया और विषपान कर लिया। परंतु उन्होंने उस विष को अपने गले से नीचे नहीं जाने दिया। उस विष के प्रभाव से उनका गला नीला पड़ गया और इसी प्रकार भगवान शिव नीलकंठ के नाम से भी जाने गए।ऐसा माना जाता है कि विषके प्रभाव को कम करने के लिए भगवान शिव ने इस पहाड़ पर तपस्या की जिससे इस जगह का नाम भी नीलकंठ पड़ गया।

इस मंदिर निर्माण की शैली दक्षिण भारत के मंदिरों की शैली से मिलती जुलती है। इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर समुंद्र मंथन का दृश्य मूर्तियों द्वारा दिखाया गया है। मंदिर के गर्भ गृह में शिवलिंग स्थापित किया गया है जिसकी पूजा होती है और जिस पर जल, बेलपत्र, धतूरा आदि चढ़ाए जाते हैं। प्रसाद के रूप में चावल की फुलियां व मीठेचीनीकेदाने बांटे जाते हैं।मंदिर में दर्शन करने से पूर्व कुछ श्रद्धालु पहाड़ों से बहते हुए झरने के ठंडे पानी में स्नान भी करते हैं।

नील कंठ का बाज़ार व अन्य सुविधाएं:

नीलकंठ मंदिर के बाहर सामान्यतः प्रसाद की दुकानें हैं जिनमें से कुछ बड़ी और कुछ छोटी हैं।सैलानियों की ज़रूरत का छोटा मोटा सामान भी वहां कुछ दुकानों पर मिलता है परंतु वहां कोई बड़ी दुकान नहीं है जहांअच्छी तरह से शॉपिंगहोसके। दुकानों पर ज्यादातर मूर्तियां, शिवलिंग, हाथों में बांधने वाले अलग अलग किस्म के कंगन याब्रेसलेट, लॉकेट, अंगूठियां, तस्वीरें, चाबी के छल्ले और इसी प्रकार का दूसरा सामान मिलता है जिसे श्रद्धालुगण यादगार के तौर पर या दूसरों को गिफ्ट करने के लिए ले जाते हैं।बाज़ार की सड़क ज्यादा चौड़ी नहीं है जिसकी वजह से गाड़ियां वहां से गुजरने में कठिनाई होती है। बाज़ार से काफी पहले ही गाड़ियों को रोक देना पड़ता है।
खाने पीने की भी कुछ दुकानें हैं परंतु उनका स्टैंडर्ड कुछ बहुत अच्छा नहीं है। हालांकि अब एक फूड कोर्ट खुल गया है जहां पर अलग-अलग किस्म का साफ़ और स्वच्छ खाना आपको मिल सकता है।

 

ध्यान देने योग्य बातें:

               
1. मौसम के अनुरूप अपने साथ गर्म कपड़े अवश्य रखें
2. पहाड़ों पर धूप काफी तेज होती है इसके लिए धूप का चश्मा होना बेहतर रहेगा

3. अपनी दवाइयां और खाने पीने का सामान अपने साथ अवश्य रखें

4. घुमावदार सड़के होने की वजह से कुछ लोगों को उल्टी की शिकायत हो सकती है। उसके लिए पहले से ही ऋषिकेश से चलते समय एंटीवोमिटिंग दवाई खाकर चलें।
5. मंदिर में दर्शन करके अपनी गाड़ी तक वापस आने में लगभग 1 घंटे का समय लगता है अपने आने-जाने के समय को उसी के हिसाब से व्यवस्थित करें।बाज़ार में घूमने या खाना खाने में और अधिक समय लग सकता है इसका ध्यान रखें।

6. बच्चों और बुजुर्गों का हाथ पकड़ कर रखें। पहाड़ी पर होने की वजह से नीचे गहरी ढलान है जो खतरनाक हो सकती है।

7. ऋषिकेश से नीलकंठ जाने वाली सड़क पर कोई पेट्रोल पंप नहीं है अतः इसका ध्यान रखें कि आपके पास आने जाने के लिए उचित मात्रा में ईंधन उपलब्ध है।

8. क्योंकि यह पहाड़ी रास्ता पर्वत को काटकर बनाया गया है इसलिए इसमें कई तीव्र मोड हैं और रास्ता घुमावदार है। इसलिए सिर्फ प्रशिक्षित और अनुभवी चालकों को ही यहां गाड़ी चलानी चाहिए।

9. यूं तो मंदिर के पास एक छोटी पार्किंग उपलब्ध है। किंतु ज्यादा श्रद्धालुओं के आने की स्थिति में वहां जगह नहीं मिल पाती है। इसके लिए गूगल मैप का सदुपयोग करें और ट्रैफिक जाम होने की स्थिति में अपनी गाड़ी को मंदिर से कुछ दूरी पर ही पार्क कर लें और बाकी का रास्ता पैदल ही तय करें। इससे आपको वापसी में भी सुविधा होगी।

10. पहाड़ों पर रात की अपेक्षा दिन के उजाले में ड्राइव करना ज्यादा आसान होता है। अपने समय को इस प्रकार व्यवस्थित करें कि मंदिर में दर्शन करके आप दिन ही दिन में वापस ऋषिकेश तक आ पाएं।

 

आपकी यात्रा शुभ हो
बम बम भोले
हर हर महादेव

आर एस शांडिल्य
18.02.2022